मेरे चले जाने के बाद उसने खिड़की तो जरुर खोली होगी,
और ढूंढा होगा बेचैन नजरो से उस मोड़ तक,
जिस मोड़ तक उसकी नज़रे गई होंगी |
जैसे मुड़ के देखा था मैंने कई बार,
उसने भी नज़रे कई बार दौड़ाई होगी
घूमी होगी वो खिड़की से जिस पल,
उसकी रूह भी उस पल जुरूर रोई होगी |
इस बात पे तो तुमसे शर्त भी लगा लू मैं,
कि उसने फिर खिड़की बहुत जोरो से बंद की होगी,
उसे भी याद न रहा होगा वो मंजर,
जिस पल वो बिस्तर पे यूं ही गिरी होगी |
वो न उठी होगी बिस्तर से लिपटकर तब तक,
जब तक कि उसको किसी ने बाहर से आवाज न दी होगी,
बहाना उसने भी जुरूर बनाया होगा उसके सर दर्द का,
जब उससे एक गिलास पानी की फरमाईश किसी ने की होगी |
फिर उसने सम्भाला होगा खुद को मुश्किल से,
और नज़रे उसने सबसे जुरुर छुपाई होंगी ,
मशगूल रहा होगा उसका दिलो- दिमाग मुझमे शायद ,
ठोकर से, उसने जो कोई चीज गिराई होगी |
दी होगी संभल कर चलने की हिदायत उसकी माँ ने जुरुर उसे
मेरी तरह कहूँ या उसकी तरह ऐ मेरे दोस्त
ताउम्र उसने फिर शायद कभी गलती ऐसी न दोहराई होगी..
Aditya 'Again'
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