मै मर भी जाता तो कैसे,
और संभल भी जाता तो कैसे,
तुमने झूठी कसमे ही खाई थी इतनी,
कि दरिया का पानी उतरता चला गया |
मै मुत्मईन था कि तुम लौट आओगे,
मुन्तजिर रहा शाम से सहर तक,
पहले दिल रूठा था, फिर तो पत्थर ही बन गया,
मेरी इनायतों पर तुम्हारा ही हक रहा शायद,
तभी तो ये पत्थर-ए-दिल पिघलता चला गया |
कौन सा भरोसा, कहाँ का भरोसा,
खुद की मरने की तैयारी करने में नाकाफी रहा मै,
और तुम भी न आये,
फिर तो ये ‘सूरज’ ढलता ही चला गया |
थपेड़े, ठोकरे, उलझने, बेचैनी और फिर तन्हाई,
सब कुछ दिया तुमने,
शुक्रगुज़ार हूँ तेरी रिवायत का, कि तुम तनहा कर
ही गए,
और मै ज़िन्दगी की राह में
संभलता चला गया |