Monday, 12 February 2018

चलो माना रही होंगी शिकायतें

चलो माना रही होंगी शिकायतें,
तो क्या तुम वादे से मुकर जाओगे?
खो के तुम भी देखो किसी दिन खुद को,
क्या शुकूँ मिलता है, लौट कर जब तुम घर जाओगे ?

ज़िस्म ही ज़िस्म की नुमाइश है बाज़ार में,
और इक हुज़ूम है कतार में, अब कहाँ जाओगे ?
इक बुत के मानिन्द जो बन रहे हो तुम,
बोलो अब उसमे रूह कहाँ से लाओगे ?

चलो माना कि किसी किरदार में जा बैठे हो ?
तो क्या ऐसे ही रहोगे, लौटकर जब अपने शहर जाओगे ?
तुम्हारा होकर भी औरों का लिबास पहने हूँ मैं भी,
जान जाओगे जिस दिन, गले से लिपट जाओगे |

तुम फिर से याद करोगे पुराने किस्सों को,
अन्दर ही अन्दर  जब तुम बिखर जाओगे,
रंजिशों से कहोगे कि जश्न कल की शब कर लें,
मोहब्बतों को पुकारोगे, खुद को भी नज़र नहीं आओगे |

इक मोहब्बत में तुम भी क्या कर बैठे हो ?
तुम भी तो तीरगी से नाता जोड़ बैठे हो ?
यकीं कर लो, बड़ी रौशनी होगी चरागों में,
जिस दिन तुम अंधेरों से निकल जाओगे | 
-- Aditya ' Suraj'