Saturday, 28 October 2017

मैं अपना किरदार छोड़ आया हूँ |

जाने क्यूँ वो मुक़द्दस सा संसार छोड़ आया हूँ ?
जैसे अन्ज़ान गलियों में कोई भगवान छोड़ आया हूँ |
मेरी खता को अब भी क्यूँ छुपाये बैठा है वो  ?
शायद उसके हिस्से में अश्कों का आबशार छोड़ आया हूँ |

मेरी गुफ्तगू का एक ही  हिस्सा क्यूँ मुकम्मल हुआ था ?
फिर तो आधा शुकून -- करार छोड़ आया हूँ |
अब सलाम किसी के लबो से निकले निकले !
मैं उसके सीने में मोहब्बत का त्यौहार छोड़ आया हूँ |

खुशियों के क़त्ल का इलज़ाम किसी और पे क्यूँ लगे  ?
मैं ही अपने पीछे एक पहचान छोड़ आया हूँ |
जिसे दुनिया समझती रही गुज़रा हुआ एक अरसा ,
अब उसकी गली में वो इंसान छोड़ आया हूँ |

फ़कत सितारे भी टिमटिमाना छोड़ ही देते ,
मैं उनके बीच एक चाँद छोड़ आया हूँ |
मैंने ही थपकियाँ देकर सुलाया है ग़मों को ,
और चुप-चाप खुशियों की तकरार छोड़ आया हूँ |

सच को मुकाम तक पहुंचने की ताबीर ही थी ,
फिर तो सारे सपनो को बेदार छोड़ आया हूँ |
झूँठ ही सच है इस जहाँ में , यकीं कर लो,
मैं सारे शहर में ये इश्तिहार छोड़ आया हूँ |

समुन्दर ने बहुत मौके दिए थे डूब जाने  के ,
मैं ही था जो साहिल पे उसको हर बार छोड़ आया हूँ |
शायद अब लफ्ज़ो के असर से पत्थर नहीं पिघलते ,
फिर भी चंद लफ्ज़ मैं उसमे असरदार छोड़ आया हूँ |

ख़ामोशियाँ ख़ामोशी से सोती ही रही ,
मैं सारे लफ्ज़ो को श्मशाम छोड़ आया हूँ |
ये बदला लेने का मेरा ही अंदाज़ था ' सूरज ',
मैं  उसे छोड़ उसमे अपना किरदार  छोड़ आया हूँ |

                                                                                Aditya 'Suraj'