जाने क्यूँ वो मुक़द्दस सा संसार छोड़ आया हूँ ?
जैसे अन्ज़ान गलियों में कोई भगवान छोड़ आया हूँ |
मेरी खता को अब भी क्यूँ छुपाये बैठा है वो ?
शायद उसके हिस्से में अश्कों का आबशार छोड़ आया हूँ |
मेरी गुफ्तगू का एक ही हिस्सा क्यूँ मुकम्मल हुआ था ?
फिर तो आधा शुकून -ओ- करार छोड़ आया हूँ |
अब सलाम किसी के लबो से निकले न निकले !
मैं उसके सीने में मोहब्बत का त्यौहार छोड़ आया हूँ |
खुशियों के क़त्ल का इलज़ाम किसी और पे क्यूँ लगे ?
मैं ही अपने पीछे एक पहचान छोड़ आया हूँ |
जिसे दुनिया समझती रही गुज़रा हुआ एक अरसा ,
अब उसकी गली में वो इंसान छोड़ आया हूँ |
फ़कत सितारे भी टिमटिमाना छोड़ ही देते ,
मैं उनके बीच एक चाँद छोड़ आया हूँ |
मैंने ही थपकियाँ देकर सुलाया है ग़मों को ,
और चुप-चाप खुशियों की तकरार छोड़ आया हूँ |
सच को मुकाम तक पहुंचने की ताबीर ही न थी ,
फिर तो सारे सपनो को बेदार छोड़ आया हूँ |
झूँठ ही सच है इस जहाँ में , यकीं कर लो,
मैं सारे शहर में ये इश्तिहार छोड़ आया हूँ |
समुन्दर ने बहुत मौके दिए थे डूब जाने के ,
मैं ही था जो साहिल पे उसको हर बार छोड़ आया हूँ |
शायद अब लफ्ज़ो के असर से पत्थर नहीं पिघलते ,
फिर भी चंद लफ्ज़ मैं उसमे असरदार छोड़ आया हूँ |
ख़ामोशियाँ ख़ामोशी से सोती ही रही ,
मैं सारे लफ्ज़ो को श्मशाम छोड़ आया हूँ |
ये बदला लेने का मेरा ही अंदाज़ था ' सूरज ',
मैं उसे छोड़ उसमे अपना किरदार छोड़ आया हूँ |
Aditya 'Suraj'