Sunday, 3 May 2015
Friday, 3 April 2015
ये जो तुम आज थोड़ा बदले से हो.....
ये जो तुम आज थोड़ा बदले से हो....
ये जो तुम आज थोड़ा बदले से हो !
थोड़े बहके से हो
और थोड़े चहके से हो !
कोई तो राज छुपा रखा है
इन आँखों में तुमने
नही तो फिर तुम क्यू सहमे से हो ?
और गुम से हो तुम कहीं
या फिर कहीं खोये से हो ?
कोई अंजाम बना रखा है
अपने दिल के किसी कोने में
नहीं तो फिर क्यू लगता है कि
तुम सोये से हो ?
तुम्हारी शिकायत है कि मैं
खुद की बात नहीं करता,
तुम ये बखूबी जानते हो कि,
मै क्या हूँ, कुछ भी तो नहीं हूँ!!!!!
फिर
क्यू बस गए हो किसी के करीब इतना
कि लगता है कभी कि,
तुम कोई सपने से हो
या फिर कोई अपने से हो ?
Aditya 'Again'
Tuesday, 17 March 2015
फिर कुछ दिन बीत जाने के बाद.....
फिर कुछ दिन बीत जाने के बाद,
कहानी ने शायद खुद को दोहराया होगा,
जो नाम लिया होगा किसी ने गलती से मेरा उसके घर पे,
चेहरा शिकन में उसने खुद का जुरूर पाया होगा !
शायद तोड़ी होगी ख़ामोशी उसने फिर नाहक यूं ही,
या छुपाई होगी उसने अपने दिल की बात दिल में,
पर कर ली होंगी उसने बंद अपनी आँखें उस पल,
और चेहरा दोनों हांथो से जुरूर छुपाया होगा |
फिर गई होगी उस खिड़की तक कई बार,
दिल हाँथ में लेकर वो कमोबेश,
और सूनसान रास्ते को कई बार – जी भर के जुरूर निहारा होगा..
ये मुझे क्या मालूम होगा मेरे दोस्त,
पर उस शाम बेचैनी ने कुछ तो जाहिर किया ही होगा,
पूछा होगा शायद उसके भाई ने जो हाल उनका ,
उसने बहाना फिर कोई नायाब बनाया होगा..
की होगी उसने बात फिर किसी से मेरे बारे में शायद,
और चुपके से उसे नाम मेरा जरुर बाताया होगा..
समझाया होगा उस सहेली ने उसे यूँ ही देर तक,
और दिलासा दी होगी सब सही हो जाने की,
शायद उसने आंसू का जो एक कतरा कहीं गिराया होगा..
ठहरा होगा उसका भी वक्त एक वक़्त के लिए,
उसने मन ही मन मेरा नाम जो खुद को सुनाया होगा,
और की होगी दीवारों से कुछ देर तक बातें,
जब तक की उसने कोई जबाब न पाया होगा..
होता हूँ परेशान मै भी ये सोच कर
कि सहमी होगी वो और शायद चिल्लाई भी होगी,
जख्म शायद जो खुद ही हांथो में उसने कोई नया बनाया होगा..
Aditya 'Again'
Monday, 2 March 2015
मेरे चले जाने के बाद उसने खिड़की तो जरुर खोली होगी....
मेरे चले जाने के बाद उसने खिड़की तो जरुर खोली होगी,
और ढूंढा होगा बेचैन नजरो से उस मोड़ तक,
जिस मोड़ तक उसकी नज़रे गई होंगी |
जैसे मुड़ के देखा था मैंने कई बार,
उसने भी नज़रे कई बार दौड़ाई होगी
घूमी होगी वो खिड़की से जिस पल,
उसकी रूह भी उस पल जुरूर रोई होगी |
इस बात पे तो तुमसे शर्त भी लगा लू मैं,
कि उसने फिर खिड़की बहुत जोरो से बंद की होगी,
उसे भी याद न रहा होगा वो मंजर,
जिस पल वो बिस्तर पे यूं ही गिरी होगी |
वो न उठी होगी बिस्तर से लिपटकर तब तक,
जब तक कि उसको किसी ने बाहर से आवाज न दी होगी,
बहाना उसने भी जुरूर बनाया होगा उसके सर दर्द का,
जब उससे एक गिलास पानी की फरमाईश किसी ने की होगी |
फिर उसने सम्भाला होगा खुद को मुश्किल से,
और नज़रे उसने सबसे जुरुर छुपाई होंगी ,
मशगूल रहा होगा उसका दिलो- दिमाग मुझमे शायद ,
ठोकर से, उसने जो कोई चीज गिराई होगी |
दी होगी संभल कर चलने की हिदायत उसकी माँ ने जुरुर उसे
मेरी तरह कहूँ या उसकी तरह ऐ मेरे दोस्त
ताउम्र उसने फिर शायद कभी गलती ऐसी न दोहराई होगी..
Aditya 'Again'
Sunday, 1 March 2015
चलो आज फिर ये जहाँ बाँट लेते हैं...
चलो आज फिर ये जहाँ बाँट लेते हैं,
कुछ अच्छा और कुछ बुरा बाँट लेते हैं,
थोड़ी सी हंसी बाँट लेते हैं,
थोड़ी सी खुशी बाँट लेते हैं,
चलो अपने ये सपने बाँट लेते हैं,
और चाहो तो ये अपने भी बाँट लेते हैं,
ख्यालो की सादगी बाँट लेते हैं,
दोस्तों की बन्दिगी बाँट लेते हैं,
चलो कुछ कल बाँट लेते हैं,
और कुछ आज अभी बाँट लेते हैं,
चलो आज फिर ये जहाँ बाँट लेते हैं|
तुमसे ज्यादा परेशान है तुम्हारा वो
पुराना दोस्त,
चलो आज उसकी परेशानी बाँट लेते हैं|
थोडा सा आकाश बाँट लेते हैं,
थोड़ी सी जमी बाँट लेते हैं,
थोड़ी सी आँखों की नमी बाँट लेते हैं,
थोड़ी सी ये बारिश बाँट लेते हैं,
और बारिश की ये पहली बूंद बाँट लेते
हैं,
चलो फिर से ये जहाँ बाँट लेते हैं|
रातो का घना अँधेरा बाँट लेते हैं,
सूरज की रोशनी तो पहले ही मशगूल है
कहीं,
चलो आज ये सवेरा बाँट लेते हैं,
चलो खोजते है कि कोई नाखुश है क्या
मेरे दोस्त?
और फिर उसकी नाखुशी बाँट लेते हैं,
या उसकी बेरुखी बाँट लेते हैं,
अगर परेशान है अब भी वो तुम्हारा
पुराना दोस्त !!
तो उसकी फिर से उसकी परेशानी बाँट लेते
हैं,
चलो आज ये जहाँ बाँट लेते हैं,
कुछ आज और कुछ अभी बाँट लेते हैं|
Aditya 'Again'
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