तुझे और भी बहाने ढूढने होंगे जुदा होने के,
यूँ ही तो नहीं कोई किसी से जुदा हो जाता है |
एक अरसा लगा था तुम्हारी रूह तक पहुँचने में,
यूँ ही तो नहीं कोई खुदा हो जाता है |
तमाशा तमीज से भला कहाँ होता है,
फिर भी क्यूँ तमाशबीन (तू) बेजुबां हो जाता है |
तू
मुर्शिद, मालिक, महताब या मुराद रहा होगा मेरा,
यूँ ही तो नहीं कोई याज़दां हो जाता है |
तू मौका तो देता एक वक़्त अज़ान साथ पढने का,
खुद ही मेरी ख्वाहिशों को सियाह करने का |
एक दिन तेरे रुखसार भी तेरे अश्को से भीग-भीग कर खुश्क हो
जायेंगे ,
यूँ ही तो नहीं मसला-ऐ-मोहब्बत अदा हो जाता है |
शाख हर पत्ते की गिर चुकी है ‘सूरज’,
बिना शाख भी कब पत्ता हरा हो जाता है |
कुछ तो मजबूरियां रही होंगी हयात को हलाल करने की,
यूँ ही तो नहीं कोई आसमा हो जाता है |
मेरी फिक्र की चादर से पांव जरुर निकाले होंगे तुमने,
यूँ ही तो नहीं सर्दियों से गुनाह हो जाता है |
अब तो यकीन भी हो चला है तुझसे सवाल-ऐ-फुरकत करने का,
यूँ ही तो नहीं कोई अल-विदा हो जाता है |
--Aditya