मै जिंदगी को झूंठ
में ही,
जिंदगी बनाये
बैठा हूँ,
छुपाने को नहीं
बचा कुछ अब,
फिर भी पर्दा
गिराए बैठा हूँ |
मेरे मौला मै
तुझसे क्या शिकायत करूँ ?
घर भी एक है और आँगन भी एक
है,
फिर जाने क्यूँ,
चूल्हे चार जलाये
बैठा हूँ |
तू ही खुदा है और
तू ही ईश्वर है
ये पता है, तू मुझमे में है और
उसमे भी,
फिर भी कहीं मंदिर,
तो कहीं मस्जिद
बनाये बैठा हूँ |
फलक तू तो बहुत
दूर की बात है,
वाकिफ़ हूँ कि वजूद कब्र से ज्यादा न
है,
फिर भी किस आस
में,
अपने हाथों को
कासा बनाये बैठा हूँ |
कैसे बैठेगा वो
कबूतर,
मेरी सरहदों पर,
मैंने दाने तो
बिखेर दियें है छत पर.
पर जाने क्यूँ
फिर भी पैर जमाये बैठा हूँ |
मेरी मुश्किल बस
इतनी सी है,
कि क्या सही है , क्या गलत है
ये जानता हूँ,
फिर भी ज़हर को
मीठा बताये बैठा हूँ |
मै जिंदगी को झूठ
में ही,
जिंदगी बनाये
बैठा हूँ |
मै जिंदगी को..
Aditya
‘Again'