Tuesday, 15 November 2016

मै जिंदगी को झूंठ में ही, जिंदगी बनाये बैठा हूँ |



मै जिंदगी को झूंठ में ही,
जिंदगी बनाये बैठा हूँ,
छुपाने को नहीं बचा कुछ अब,
फिर भी पर्दा गिराए बैठा हूँ |

मेरे मौला मै तुझसे क्या शिकायत करूँ ?
घर भी एक है और आँगन भी एक है,
फिर जाने क्यूँ,
चूल्हे चार जलाये बैठा हूँ |

तू ही खुदा है और तू ही ईश्वर है
ये पता है, तू मुझमे में है और उसमे भी,
फिर भी कहीं मंदिर,
तो कहीं मस्जिद बनाये बैठा हूँ |

फलक तू तो बहुत दूर की बात है,
वाकिफ़ हूँ कि वजूद कब्र से ज्यादा न है,
फिर भी किस आस में,
अपने हाथों को कासा बनाये बैठा हूँ |

कैसे बैठेगा वो कबूतर,
मेरी सरहदों पर,
मैंने दाने तो बिखेर दियें है छत पर.
पर जाने क्यूँ फिर भी पैर जमाये बैठा हूँ |

मेरी मुश्किल बस इतनी सी है,
कि क्या सही है , क्या गलत है
ये जानता हूँ,
फिर भी ज़हर को मीठा बताये बैठा हूँ |

मै जिंदगी को झूठ में ही,
जिंदगी बनाये बैठा हूँ |

मै जिंदगी को..

                                                                                 Aditya ‘Again'