फिर कुछ दिन बीत जाने के बाद,
कहानी ने शायद खुद को दोहराया होगा,
जो नाम लिया होगा किसी ने गलती से मेरा उसके घर पे,
चेहरा शिकन में उसने खुद का जुरूर पाया होगा !
शायद तोड़ी होगी ख़ामोशी उसने फिर नाहक यूं ही,
या छुपाई होगी उसने अपने दिल की बात दिल में,
पर कर ली होंगी उसने बंद अपनी आँखें उस पल,
और चेहरा दोनों हांथो से जुरूर छुपाया होगा |
फिर गई होगी उस खिड़की तक कई बार,
दिल हाँथ में लेकर वो कमोबेश,
और सूनसान रास्ते को कई बार – जी भर के जुरूर निहारा होगा..
ये मुझे क्या मालूम होगा मेरे दोस्त,
पर उस शाम बेचैनी ने कुछ तो जाहिर किया ही होगा,
पूछा होगा शायद उसके भाई ने जो हाल उनका ,
उसने बहाना फिर कोई नायाब बनाया होगा..
की होगी उसने बात फिर किसी से मेरे बारे में शायद,
और चुपके से उसे नाम मेरा जरुर बाताया होगा..
समझाया होगा उस सहेली ने उसे यूँ ही देर तक,
और दिलासा दी होगी सब सही हो जाने की,
शायद उसने आंसू का जो एक कतरा कहीं गिराया होगा..
ठहरा होगा उसका भी वक्त एक वक़्त के लिए,
उसने मन ही मन मेरा नाम जो खुद को सुनाया होगा,
और की होगी दीवारों से कुछ देर तक बातें,
जब तक की उसने कोई जबाब न पाया होगा..
होता हूँ परेशान मै भी ये सोच कर
कि सहमी होगी वो और शायद चिल्लाई भी होगी,
जख्म शायद जो खुद ही हांथो में उसने कोई नया बनाया होगा..
Aditya 'Again'