Sunday, 12 March 2017

जाने कैसा सा भरोसा रहा मुझ पर ?


कौन जाने उसका ये कौन सा भारोसा था, जो टूटा ही नहीं,
दूर चला आया था मै, पर उसका साथ छूटा ही नहीं,
कोई फैसला था ऊपर वाले का, जो फासला उतना ही रहा,
खुदा जाने कौन सी बात थी उसमे, कि वो मुझसे कभी रूठा ही नही |

मै ढूँढ ही लाता हर हाल में उसे,
पर वो कभी खोया ही नहीं,
सीने से लपेटने की तमन्ना अधूरी ही रह गई,
वो मेरे सामने कभी रोया ही नहीं |

मेरा शुकून बन गया था वो, पर उसको कभी बताया ही नहीं,
उसके दिल में भी कोई राज था शायद, पर उसने भी कभी बताया ही नहीं,
मेरे ज़ख्म जाने कब देखे थे छुपके उसने,
आहिस्ता आंसुओ का सामना कर ही लेता वो,
पर उसने कभी खुद को बीमार बताया ही नहीं |

मुझसे मेरा हाल पूछ ही लेता वो,
पर अपना हाल कभी सुनाया ही नहीं,
मेरे हिस्से की दुआएँ मांग ही लाता वो,
पर उसने ग़म का खज़ाना कभी दिखाया ही नहीं |

जाने कौन सी आदत रही उसमे,
जाने किस फ़रिश्ते से ताल्लुक रहा उसका,
जाने कैसा सा भरोसा रहा मुझ पर,
उसने धड़कने तो सुना दी थी मुझे,
पर मेरी थी या उसकी, ये राज उसने कभी बताया ही नहीं |

खुदा जाने वो क्यू बिछड़ गया मुझसे,
मैंने ये सवाल उससे उठाया ही नहीं,
उसका मुस्कुराना किसी सावन से कम न था,
पर उसने फिर कभी आसमान से प्यार बरसाया ही नहीं |

बार बार पूछा था किसी ने शायद,
पर अपने नाम के साथ उसने मेरा नाम बताया ही नहीं,
जाने कौन सी खता कर दी थी मैंने,
शायद ये सवाल खुद से फिर कभी दोहराया ही नही |
                                                                                                           -   Aditya

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