सहारा उधार लाया था मैं,
थोडा सा माँ का प्यार लाया था मैं,
सोचा था की अब माँ का लाडला बड़ा हो गया,
साथ में अपने ये वहम लाया था मैं |
ढलती शाम से डर जाता था मैं,
उतरते चाँद से सहम जाता था मैं,
वो माँ ही थी जिसको ये सब पता था बखूबी,
इसलिए माँ की तश्वीर साथ लाया था मैं |
नाराज़ खुद से हूँ या किसी से, किधर जाता था मैं
माँ साथ में हो तो उसको नज़र आता था मैं,
उसने बताया था की इसमें भी मैं ही हूँ,
बस इतनी सी बात थी, तभी तो माँ की दी ताबीज़ साथ
लाया था मैं |
नाराज़ तो कई बार उससे बेवजह हो जाता था मैं,
वो मना लेती और मान जाता था मैं,
ये वो सिलसिला है जो दोहराया ही नहीं जा सकता,
जाने कहानी का कौन सा पन्ना मोड़ आया था मै |
वो जो शाम को देर से आता था मैं,
थक हार कर खेल कर आता था मैं,
माँ ने डाँटा और मारा भी था शायद कभी,
ये सारा का सारा किस्सा छोड़ कर आया था मैं |
वो भूखी ही बैठी रही जब भी देर से आता था मै,
उसका प्यार ही कुछ ऐसा है, सब कुछ भूल जाता था मैं,
कितना ही वो खोई हो दुःख के सागर में,
कुछ बात ऐसी बोल ही देती, देर तक खिलखिलाता था
मै |
समझने में वक़्त लगा कि माँ का प्यार कभी थोडा
हो ही नहीं सकता,
चलते वक़्त वो रो ही देती लिपटकर मुझसे,
कि मै जा भी तो रहा हूँ बस तेरी ही खातिर,
क्या सही ? क्या गलत ?, पर उसके कान में ये बोल आया था मैं |
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